चित्त-शुद्धि: अंतर्मन की स्वच्छता से परमात्मा तक का मार्ग – Self-Purification in Indian Spirituality

अध्यात्म का वास्तविक अर्थ बाहरी कर्मकांडों या वेशभूषा में नहीं, बल्कि मन की आंतरिक निर्मलता में निहित है। भारतीय अध्यात्म के तीन प्रखर पुंजों— श्रीतैलंग स्वामीजी, श्रीउड़िया बाबा और स्वामी अखण्डानन्द सरस्वती के दिव्य अनुभवों पर आधारित यह लेख ‘चित्त-शुद्धि’ या Self-Purification in Indian Spirituality के गूढ़ रहस्य को उजागर करता है। जहाँ तैलंग स्वामीजी इसे समस्त धर्मों का सार बताते हैं, वहीं उड़िया बाबा विवेक और ध्यान के माध्यम से राग-द्वेष मिटाने पर बल देते हैं। स्वामी अखण्डानन्द जी मन के मनोवैज्ञानिक अंतराल को समझकर ‘तत्काल’ शांति पाने का मार्ग दिखाते हैं। यह विश्लेषण हमें सिखाता है कि कैसे इन्द्रिय-संयम और आत्म-बोध के द्वारा हम इसी क्षण जीवन में पवित्रता और ईश्वरीय आनंद का अनुभव कर सकते हैं। आइए हम इस लेख को समझने का प्रयास करेंगे।

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Self-Purification in Indian Spirituality
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चित्त-शुद्धि: अंतर्मन की स्वच्छता से परमात्मा तक का मार्ग – Self-Purification in Indian Spirituality

यह लेख भारतीय अध्यात्म के तीन महान स्तंभों—श्रीतैलंग स्वामीजी, श्रीउड़िया बाबा और स्वामी अखण्डानन्द सरस्वती—के दिव्य विचारों का एक संकलित और विस्तृत विश्लेषण है। इसका मूल उद्देश्य ‘चित्त-शुद्धि’ (मन की पवित्रता) Self-Purification in Indian Spirituality के गूढ़ रहस्यों को सरल और व्यावहारिक भाषा में समझना है।

चित्त-शुद्धि Self-Purification in Indian Spirituality : अध्यात्म का प्राण और जीवन का आधार

अक्सर हम धर्म को बाहरी कर्मकांडों, वेशभूषा या विशेष प्रार्थना विधियों तक सीमित कर देते हैं। लेकिन यदि हम महान तत्त्वदर्शी महात्माओं के वचनों को गहराई से देखें, तो धर्म का वास्तविक मर्म केवल एक ही शब्द में समाहित है—चित्त-शुद्धि। महात्मा श्रीतैलंग स्वामीजी के अनुसार, चित्त की शुद्धि Self-Purification in Indian Spirituality केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि विश्व के प्रत्येक धर्म का ‘अर्क’ है। चाहे कोई हिंदू हो, मुसलमान हो या ईसाई, उसकी श्रेष्ठता का पैमाना यह नहीं है कि वह कितनी बार मंदिर, मस्जिद या चर्च जाता है, बल्कि यह है कि उसका चित्त कितना निर्मल है। जिसका चित्त शुद्ध नहीं, उसका कोई धर्म नहीं। धर्म का अर्थ ही वह आचरण है जो मनुष्य को भीतर से स्वच्छ कर दे।

इन्द्रिय-संयम: दमन नहीं, अनुशासन

चित्त-शुद्धि की दिशा में पहला कदम ‘इन्द्रिय-संयम’ है। यहाँ एक बहुत बड़ी गलतफहमी को दूर करना आवश्यक है , कि चित्त शुद्धि Self-Purification in Indian Spirituality इन्द्रियों के विनाश की बात नहीं करती । अर्थात संयम का अर्थ इन्द्रियों का विनाश या उनका उच्छेद करना नहीं है। स्वामीजी स्पष्ट कहते हैं कि हमें अपनी इन्द्रियों को नष्ट नहीं करना है, बल्कि उन्हें अपने वश में करना है। सच्चा संयमी वह है जो इन्द्रियों का स्वामी है, गुलाम नहीं। स्वामीजी स्पष्ट करते हैं कि जो बाहर से साधु है पर भीतर से वासनाओं में जल रहा है, वह वास्तविक चित्त शुद्धि – Self-Purification in Indian Spirituality के मार्ग से भटक गया है।

उदाहरण के लिए, भोजन का त्याग कर देना संयम नहीं है। शरीर और स्वास्थ्य की रक्षा के लिए जितने भोजन की आवश्यकता है, उसे स्वीकार करना धर्म सम्मत है। दोष भोजन में नहीं, बल्कि ‘भोजन-लोलुपता’ (स्वाद के प्रति आसक्ति) में है। संयम का अर्थ है—इन्द्रियों के मालिक बनना, उनके गुलाम नहीं।

सच्चा संयमी कौन है?

आज के दौर में कई लोग समाज में मान-प्रतिष्ठा पाने के लिए या ‘लोक-लज्जा’ के डर से खुद को संयमी दिखाते हैं। वे बाहर से तो साधु दिखते हैं, लेकिन उनके भीतर इच्छाओं की ज्वाला धधकती रहती है। स्वामीजी ऐसे पाखंड के प्रति सावधान करते हैं। वे कहते हैं कि जो व्यक्ति बाहर से संयमी है पर भीतर से वासनाओं में जल रहा है, वह उस व्यक्ति से बेहतर नहीं है जो खुलेआम भोगों में लिप्त है। दोनों ही समान रूप से पतन के भागी हैं। वास्तविक संयम वह है जहाँ इन्द्रियों की तृप्ति की कोई तीव्र लालसा शेष न रहे, केवल कर्तव्य भाव से कर्म हों।

चित्त-शुद्धि के साधन: विवेक और ध्यान

संत श्रीउड़िया बाबा चित्त-शुद्धि के लिए दो आंतरिक औजारों—विवेक और ध्यान—को अनिवार्य मानते हैं। उनके अनुसार, चित्त शुद्धि या Self-Purification in Indian Spirituality तब तक संभव नहीं जब तक हम ‘नित्य’ और ‘अनित्य’ के बीच भेद करना न सीख लें। विवेक से प्राप्त ज्ञान को स्वभाव बनाने के लिए ध्यान की आवश्यकता होती है, जो चित्त की चंचलता को समाप्त करता है। संत प्रवर श्रीउड़िया बाबा चित्त-शुद्धि की प्रक्रिया को और अधिक सूक्ष्म स्तर पर ले जाते हैं। उनके अनुसार, केवल बाहरी क्रियाओं से काम नहीं चलेगा; इसके लिए दो आंतरिक औजारों की आवश्यकता है: विवेक और ध्यान। आदित्य ह्रदय स्तोत्र – Aditya Hridaya Stotra

विवेक

यह वह दृष्टि है जो हमें ‘नित्य’ (आत्मा) और ‘अनित्य’ (नाशवान संसार) के बीच भेद करना सिखाती है। जब तक हम यह नहीं समझेंगे कि सुख का स्रोत बाहर की वस्तुओं में नहीं बल्कि भीतर की शांति में है, तब तक चित्त भटकता रहेगा। नौ प्रकार की भक्ति या नवधा भक्ति nau prakaar kee bhakti ya navadha bhakti 

ध्यान

विवेक से प्राप्त ज्ञान को स्थिर करने के लिए ध्यान अनिवार्य है। बिना अभ्यास के ज्ञान केवल बौद्धिक व्यायाम बनकर रह जाता है। ध्यान उस ज्ञान को हमारे स्वभाव का हिस्सा बना देता है।

राग-द्वेष और अहंकार का समाधान

मन की अशुद्धि का मूल कारण राग और द्वेष हैं। श्रीउड़िया बाबा का मानना है कि चित्त शुद्धि या  Self-Purification in Indian Spirituality की सफलता की पहचान यही है कि आपके मन से घृणा और अत्यधिक मोह समाप्त हो जाए। जब व्यक्ति अपने अहंकार को परमात्मा की ओर मोड़ देता है, तो वह ‘पवित्र राग’ उसके समस्त विकारों को भस्म कर देता है।

राग-द्वेष

चित्त शुद्ध हुआ या नहीं, इसकी पहचान क्या है? श्रीउड़िया बाबा का उत्तर बहुत सीधा है: जब आपके मन से राग (अत्यधिक मोह) और द्वेष (घृणा) समाप्त हो जाएं।

अहंकार की जड़ें:

राग-द्वेष का जन्म ‘अहंकार’ से होता है। जहाँ ‘मैं’ और ‘मेरा’ (ममता) है, वहीं राग है। जहाँ ‘तू’ और ‘तेरा’ (पराई भावना) है, वहीं द्वेष है।

समाधान: राग को पूरी तरह मिटाना कठिन है, इसलिए इसे मोड़ देना चाहिए। संसार की नश्वर वस्तुओं के प्रति राग रखने के बजाय परमात्मा और महापुरुषों के प्रति राग (प्रेम) विकसित करें। यह ‘पवित्र राग’ ही संसारी विकारों को भस्म करने की शक्ति रखता है।

Self-Purification in Indian Spirituality
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अंतःकरण या चित्त की शुद्धि का सुगम उपाय

अंतःकरण की शुद्धि का मनोवैज्ञानिक मार्ग स्वामी अखण्डानन्द सरस्वती जी ने बताया है। स्वामी अखण्डानन्द सरस्वती जी एक अत्यंत आशावादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। वे सिखाते हैं कि चित्त शुद्धि या Self-Purification in Indian Spirituality कोई कठिन लक्ष्य नहीं है, यदि हम दो विचारों के बीच के उस ‘विभाजक क्षण’ (Gap) को पहचान लें। तो उस खाली अंतराल में मन स्वतः शुद्ध होता है। स्वामीजी के अनुसार, चित्त शुद्धि या Self-Purification in Indian Spirituality के लिए ‘आवश्यक परिग्रह’ और ‘कर्म की पवित्रता’ दो व्यावहारिक सूत्र हैं। अनावश्यक संग्रह का त्याग मन की चिंता को कम करता है। ब्रह्मलीन स्वामी अखण्डानन्द सरस्वती जी कहते हैं कि हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि हमारा मन हमेशा अशुद्ध ही रहता है।

शुद्ध क्षणों की पहचान:

स्वामीजी समझाते हैं कि मन में विचारों की श्रृंखला चलती रहती है। एक इच्छा पैदा हुई, वह पूरी हुई या अधूरी रही, फिर दूसरी इच्छा पैदा हुई। इन दो इच्छाओं के बीच में एक छोटा सा ‘विभाजक क्षण’ (Gap) होता है। उस क्षण में मन बिल्कुल खाली और शुद्ध होता है। उस अंतराल में कोई वासना नहीं होती, कोई विकार नहीं होता। यदि हम सजग हो जाएं, तो उस शुद्ध क्षण में ही परमात्मा का अनुभव किया जा सकता है। हम अक्सर उस ‘खाली स्थान’ को नजरअंदाज कर देते हैं और तुरंत अगले विचार में कूद जाते हैं। साधना का अर्थ है उस शुद्ध अंतराल को बढ़ाना और उस समय अपने चित्त को ईश्वर की ओर मोड़ना।

 

कर्म और पवित्रता: जीवन का संतुलन

स्वामीजी अंतःकरण की शुद्धि के लिए दो व्यावहारिक सूत्र देते हैं:–

आवश्यक परिग्रह: जीवन चलाने के लिए जितनी वस्तुओं की जरूरत है, केवल उतनी ही रखें। अनावश्यक संग्रह मन में चिंता और अशुद्धि पैदा करता है।

पवित्रता: अपने कर्मों में शुचिता लाएं। ‘गीता’ का संदर्भ देते हुए वे कहते हैं कि योगी लोग भी कर्म करते हैं, लेकिन वे फल की आसक्ति छोड़कर केवल आत्म-शुद्धि के लिए कर्म करते हैं।

चित्त-शुद्धि कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे बुढ़ापे के लिए टाल दिया जाए। स्वामी अखण्डानन्द जी एक बहुत सुंदर बात कहते हैं—”नकद सौदा लीजिये।” अध्यात्म अगले जन्म का उधार नहीं है। यदि आप आज, इसी क्षण अपने विवेक को जाग्रत करें और अपने अंतःकरण को परमात्मा के सम्मुख कर दें, तो शांति और शुद्धि का अनुभव अभी संभव है।

भारतीय अध्यात्म के तीन स्तंभ: शिवत्व, ज्ञान और भक्ति का संगम

भारतीय भूमि पर कई ऐसे संत हुए जिन्होंने अपनी उपस्थिति मात्र से समाज की दिशा बदल दी। काशी के घाटों से लेकर ब्रज की गलियों तक, श्रीतैलंग स्वामी, उड़िया बाबा और स्वामी अखण्डानन्द जी के नाम आज भी श्रद्धा के साथ लिए जाते हैं।

1. श्रीतैलंग स्वामी: काशी के जीवंत ‘विश्वनाथ’

काशी की महिमा तैलंग स्वामी के बिना अधूरी मानी जाती है। लोग उन्हें केवल एक योगी नहीं, बल्कि “साक्षात् शिव” मानते थे।

मौन की शक्ति: उन्होंने अपना अधिकांश जीवन मौन रहकर बिताया। उनके बारे में कहा जाता है कि वे लगभग 280 वर्षों तक जीवित रहे।

अतुलनीय योग: गंगा की लहरों पर घंटों स्थिर तैरना या पानी के भीतर समाधि लगा लेना उनकी सहज क्रियाएं थीं।

रामकृष्ण परमहंस का अनुभव: जब श्री रामकृष्ण परमहंस ने उनसे भेंट की, तो वे मंत्रमुग्ध रह गए और स्पष्ट कहा कि “स्वामी जी के भीतर स्वयं महादेव निवास करते हैं।”

2. उड़िया बाबा: ब्रज के विरक्त सम्राट

अगर अद्वैत वेदांत को सादगी और विरक्ति के चश्मे से देखना हो, तो उड़िया बाबा सबसे सटीक उदाहरण हैं। ब्रज की पावन रज में उन्होंने अपनी साधना को परवान चढ़ाया। क्या ब्राह्मण होना केवल जन्म से है ? जानिए क्या कहते हैं पुराण – brahmin origin in puranas

अद्वैत का स्वरूप: वे ‘सोऽहम्’ की साक्षात् प्रतिमूर्ति थे। उनका मानना था कि जब तक मनुष्य वस्तुओं का मोह (अपरिग्रह) नहीं छोड़ता, तब तक आत्मज्ञान संभव नहीं है।

ज्ञान और भक्ति का मेल: उन्होंने यह सिद्ध किया कि कृष्ण की भक्ति और वेदांत का ज्ञान एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। वे कई महान आध्यात्मिक पिपासुओं के मार्गदर्शक रहे।

3. स्वामी अखण्डानन्द सरस्वती: ‘महाराज श्री’ की वाणी का जादू

उड़िया बाबा के सबसे प्रिय शिष्यों में से एक, स्वामी अखण्डानन्द जी ने शास्त्रों के कठिन रहस्यों को जन-साधारण की भाषा में पिरोया।

भागवत के मर्मज्ञ: उन्हें भागवत पुराण का सबसे प्रामाणिक वक्ता माना जाता था। उनके प्रवचनों में तर्क भी होता था और हृदय को छू लेने वाली करुणा भी।

विरासत: वृंदावन का ‘आनंद वृंदावन आश्रम’ आज भी उनकी ज्ञान-परंपरा को जीवित रखे हुए है। उन्होंने जटिल दर्शन को इतना सरल बनाया कि वह विद्वानों और आम लोगों, दोनों के गले उतर सका।

निष्कर्ष

चित्त-शुद्धि या Self-Purification in Indian Spirituality ही जीवन का परम लक्ष्य है। प्रस्तुत लेख का सार यह है कि अध्यात्म कोई बाहरी प्रदर्शन या कर्मकांड की प्रक्रिया नहीं, बल्कि अंतःकरण के रूपांतरण का विज्ञान है। श्रीतैलंग स्वामीजी, श्रीउड़िया बाबा और स्वामी अखण्डानन्द सरस्वती—इन तीन महान विभूतियों के विचार हमें एक ही ध्रुव सत्य की ओर ले जाते हैं कि चित्त-शुद्धि ही धर्म का प्राण है। शुद्धि का अर्थ इंद्रियों का दमन करना नहीं, बल्कि उन्हें विवेक के अंकुश से अनुशासित करना है। जब हम ‘लोलुपता’ को त्यागकर ‘कर्तव्य’ की भावना से कर्म करते हैं, तब हमारी इंद्रियाँ शत्रु के बजाय मित्र बन जाती हैं। राग-द्वेष और अहंकार ही वे मल हैं जो हमारे आत्मिक प्रकाश को ढके हुए हैं। संतों का मार्गदर्शन स्पष्ट है कि यदि हम संसार की नश्वरता को समझ लें और अपने प्रेम की दिशा को वस्तुओं से मोड़कर परमात्मा की ओर कर दें, तो चित्त का निर्मल होना निश्चित है। सबसे महत्वपूर्ण सीख स्वामी अखण्डानन्द जी का ‘नकद सौदा’ वाला दृष्टिकोण है। शुद्धि कोई भविष्य की घटना नहीं है, बल्कि दो विचारों के बीच की उस रिक्तता (Gap) को पहचानने की कला है, जहाँ ईश्वर का वास है। अंततः, आत्म-शुद्धि के लिए किया गया प्रत्येक छोटा प्रयास हमें उस परम शांति के निकट ले जाता है, जो हमारा वास्तविक स्वभाव है। जीवन की सार्थकता इसी में है कि हम अपने चित्त को दर्पण की भांति स्वच्छ रखें ताकि उसमें ईश्वरीय चेतना का प्रतिबिंब स्पष्ट रूप से झलक सके।

अतः चित्त-शुद्धि को भविष्य के लिए टालना उचित नहीं है। जैसा कि स्वामीजी कहते हैं – चित्त शुद्धि या Self-Purification in Indian Spirituality एक ‘नकद सौदा’ है—यानी इसका फल इसी क्षण मिलता है। यदि हम सजग होकर अपने अंतःकरण को परमात्मा के सम्मुख कर दें, तो शांति और शुद्धि का अनुभव अभी संभव है। अतः चित्त शुद्धि या Self-Purification in Indian Spirituality का अंतिम लक्ष्य अपने चित्त को उस दर्पण की भांति स्वच्छ बनाना है, जिसमें ईश्वरीय चेतना का प्रतिबिंब स्पष्ट रूप से झलक सके।

 

 

 

 

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